शब्द – स्वैराचार
एक निराकार झंकृति इन दिनों हवा में तैर रही है। घटना अमूर्त है और बिना ठोस मानवीय आकार के सर्वत्र संचरण शील है। ब्रह्म की भांति बिना हाथ – पैर के अपना काम कर रही है। मानो उसके पीछे शाश्वत संविधान का हाथ हो। अब तो यह काफी कुछ आकार ग्रहण कर चुकी है। आरोपी के पास कोई काव्य – प्रतिभा है ही नहीं, फिर भी वह बड़ा कवि बन कर घूम रहा है। तो उसके बहिष्कार का क्या अर्थ है! वह दण्डनीय है। किन्तु दण्ड कौन देगा? जो मानसिक व्यभिचार भी न करता हो। अन्यथा उस कवयित्री को यह अधिकार है, जिसके साथ अवांछनीय चेष्टा हुई है। जिसे अपनी प्रिया ‘कल्पित’ करके उक्त कवि ने खुद को कृष्ण समझ लिया। कवि द्राक्षासव में डूबा हुआ था। रूप की मदिरा काफी नहीं थी। कविता का नशा भी अपर्याप्त था। अधिकांश लेखकों और कवियों की रचना मदिरा से ही फूटती है। मद्यपान जो चेतना को मूर्च्छित करता है और ध्यान का विरोधी है। उद्दीपन विभाव यह कि काव्य – तांत्रिक साधना में शक्ति ने भी शराब पी ली थी। एक परपुरुष के साथ बैठ कर एकान्त मद्यपान! यद्यपि उससे कवि को दुराचार करने का अधिकार नहीं मिल जाता। कविता का पारितोषिक पाने के लिए मनुष्यता का विसर्जन! सर्जनात्मक आचरण की दीक्षा के बिना अस्तित्वमान किसी भी बड़े से बड़े कवि को मैं खारिज नहीं भी करूँ, किन्तु वह मेरे लिए श्रद्धेय नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास और कबीर की रचनाएँ इसीलिए चिरंजीवी हैं कि उनके पीछे नैतिक आचरण का बल है। मैं किसी भी लंपट की आलोचना करने से पहले आत्मालोचना करना अधिक पसन्द करूँगा। फिर भी काव्य – शिक्षक का यह चरित्र समूची सृजनधर्मी बिरादरी को कलंकित करता है। पटना की घटना के अनेकायामी फलितार्थ हैं। आश्चर्य जनक है कि उत्तर आधुनिक विमर्शों में मद्यपान या फिर विपरीत लिंगी सहवास को अनैतिक या अवैध नहीं माना जाता। बशर्ते वह प्रतिपक्ष की सहमति से संयोजित हुआ हो। हम मूल्यों के अजीब विखंडन वादी दौर में जी रहे हैं।
अजित कुमार राय, कन्नौज