मिथकों से विज्ञान तक
मिथक यानि एक कथा या विश्वास जिस पर किसी समाज या संस्कृति में बहुत समय से प्रचलित कथाएँ होती है। जिसका कोई ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होता है। इसकी कथाएँ सिर्फ और सिर्फ जुबानी और विश्वास से जुड़ी होती है। जबकि विज्ञान हमारे जीवन का ऐसा अटूट हिस्सा होता है, जो हमारे जीवन के हर पहलू पर असर डालता है और उसे निर्धारित भी करता है। यानी खाना पकाने में भी विज्ञान है और रॉकेट दागने में भी; कृषि में भी विज्ञान है और स्वास्थ्य में भी; कारें रेलगाड़ियाँ और हवाई जहाज बनाने में भी विज्ञान है और ग्लोबल वार्मिंग को समझने में भी। “मिथकों से विज्ञान तक” की पुस्तक की शुरूआत ही विज्ञान क्या है? जैसे प्रश्न से होती है। विज्ञान जो लोकतंत्र, इतिहास, संस्कृति, साहित्य, परम्परा, धर्म वगैरह न जाने कितने ही ऐसे शब्द हैं जिन्हें हम यह सोचे बिना इस्तेमाल करते हैं कि कोई इनका गलत मतलब निकालेगा या हमारी बात को सिरे से समझेगा ही नहीं। जैसे लोकतंत्र से आपका क्या मतलब हैं तो जवाब आसान नहीं होगा। जब हम गूगल पर लोकतंत्र क्या हैं डालकर खोजते हैं तो कई अलग-अलग परिभाषाएँ और विचार हमारे सामने आ जाते हैं। जो शब्दों और विचारों तथा सोच की धारणा से बदलती रहती है। जबकि विज्ञान जो तथ्यों और आंकड़ों पर ही खरा साबित होता है। अकसर विज्ञान को यदि समझना है तो हम रोजमर्रा और अपने आस-पास की घटनाओं के माध्यम से भी समझ सकते हैं। ‘‘कार्ल सागान’’ भी अपनी ‘कॉस्मॉस’ में लिखते हैं- आज हमने ब्रह्मांड को समझने का एक शक्तिशाली और सुरुचिपूर्ण तरीका खोजा है, एक विधि जिसे विज्ञान कहा जाता है; इसने हमें इतने प्राचीन और इतने विशाल ब्रह्मांड के बारे में बताया है कि मानवीय मामले पहली नजर में बहुत कम मायने रखते हैं’’ विज्ञान क्या है, और धर्म क्या है, यह एक आसान सवाल लग सकता है। लेकिन जब हम विज्ञान या धर्म में अंतर ढूंढते है तो धर्म, विज्ञान के आगे कमजोर पड़ता चला जाता है। धर्म को लेकर भी मार्क्सवादी दार्शनिक फ्रेडरिक एंगेल्स के उद्धरण को भी अग्रवाल जी के द्वारा कहा गया ‘‘जैसे-2 विज्ञान आगे बढ़ता जाता है, धर्म अपने आप खत्म होता चला जाता है। उसकी जटिल भूमिका नकारात्मक भूमिका लेती चली जाती है। विज्ञान को भी सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिकों के सामने कई तरह की बाधाएँ उत्पन्न होती है। वैज्ञानिक जब किसी भी प्रश्न का हल ढूंढने के लिए कोई एक नहीं बल्कि कई तरीके अपनाते है। जब तक वे आंकड़ों या निष्कर्ष की पुख्ता जानकारी एकत्रित नहीं कर लेते हैं। तब तक निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते। कितना कठिन होता है विज्ञान की मान्यताओं को एक आदमी के द्वारा समझना। ब्रह्मांड और सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर भी कई सवाल हम सभी के मन में उत्पन्न होते हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई? इस सृष्टि को चलाने वाला कौन है। यह सृष्टि क्या भगवान चला रहा है? या अल्लाह। हमेशा से ऐसे सवाल हमारे मन मस्तिष्क में घूमते रहते है। परन्तु सृष्टि के सृजन के सिद्धान्त की कई कहानियाँ न केवल रोचक, अंतरंग, रचनात्मक, सारगर्भित है, बल्कि मानव की कल्पना की उड़ान को भी दर्शाती है। इन कहानियों के इसकी समाज की स्थापना और उसमें होने वाले बदलाव दोनों से गहरे रिश्तों को भी तलाश किया जाता है।
अफ्रीका की जनजातियों की कहानियों ने भी कई मिथकों को जन्म दिया। ‘‘थुवल नो आह हयरी’ अपनी किताब में इस बात पर जोर देते हुए नजर आए। वे मानते हैं मिथकों ने मानव समाज के गठन के हर मोड़ पर अहम भूमिका निभाई है। अफ्रीका के ‘वगुसु’ जनजाति के लोगों का मानना है कि ईश्वर ने सबसे पहले सूर्य, चन्द्रमा, सितारों और बादलों के साथ स्वर्ग बनाया फिर उसने पृथ्वी और उसके बाद मनुष्य को। अकसर कई लोककथाओं ने कई धर्मग्रन्थों को सृजन किया। इनकी जड़े हमें कहानियों तथा समय के साथ-2 साफ होता चला गया। ‘मेसोपोटामिया’ के मिथक को लेकर इतिहासकारों का तो यह मानना है कि मानव सभ्यता का इतिहास लगभग दस हजार साल पुराना है। कृषि के साथ-साथ नदियों के किनारे शहर बसने लगे और कई जगहों पर अब तक घूम-घूम कर खुराक खोजने और शिकार करने वाले कुछ कबीलों ने स्थायी बस्तियों की शुरुआत की। कई ऐसी मिथक कहानियाँ है, जो इस ब्रह्मांड की सृष्टि की आपत्ति को समझने की कोशिशों में बताई गई। कई मिथकों जैसे मिस्र, ग्रीक व चीनी सभ्यताओं के उदाहरण ने सृष्टि की उत्पत्ति को बताया। चीनी सभ्यता में ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर हर कहानी में कुछ ऐसा बताया गया है जिससे ब्रह्मांड पैदा हुआ है। चीन के सबसे पुराने ग्रन्थों में से एक ‘‘ताओ ते चिंग’’ ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से कुछ समय पहले लिखा गया था, जिसमें ब्रह्मांड के सृजन की कहानी बताई गयी है। इस तरह कई मिथक हिन्दू, जैन और बौद्ध मत में भी पाए गई है। जैन धर्म में तो भारत की सभ्यता को ऐसे दो धर्मों को जन्म देने वाला कहा गया है। जिससे इस सृष्टि ब्रह्मांड, जीव, जन्तु, और इंसान के किसी एक रचनाकार या रचनाशक्ति में विश्वास ही नहीं रखते थे।
“शेरी ईच जोहर” ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जैन धर्म के अनुसार दुनियां को पांच भागों में बांटा गया है : स्वर्ग, नरक, मनुष्यों और जानवरों के मध्य दुनियां, केवल एक इंद्रिय वाले प्राणियों का निवास और प्रबुद्ध आत्माओं का निवास है। सभी प्राणी पुनर्जन्म के एक चक्र का हिस्सा है। इस तरह अलग-अलग धर्मों और जनजातियों ने जिस तरह इस ब्रह्मांड जिन्दगी और सभ्यता तथा समाज की उत्पत्ति पर बहस की है, उसे पढ़ने के बाद तो यही लगता है अलग-अलग मिथकों ने इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति को रचा। परन्तु आज का आधुनिक विज्ञान हमें इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति को कैसे बताता है? ‘गौहर रजा’ ने इस पुस्तक से कई कठिन विषयों के अत्यंत सरल उत्तर प्रदान किया है। विज्ञान की परिभाषाओं को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने विभिन्न उदाहरणों का उपयोग करते है। हिन्दू, जैन और बुद्ध के मतों यूनानी दार्शनिक तथा तमाम वैज्ञानिकों की बातों से जिज्ञासा को बात करने पर जोर दिया है। इस पुस्तक में जहाँ यह भी दोहराया गया है कि विज्ञान विवाद के बिना प्रगति कर ही नहीं सकता, बिना गलतियों पर बिना लाग-लपेट कर बहस के बिना जो विज्ञान कसौटी पर खरा उतरता है। उसे विज्ञान माना जाता है। सही भी है-क्योंकि विज्ञान आकड़ों व सबूतों को मायने देता है न की पूजा स्थलों व धार्मिक मान्यताओं को। हमारे मन में ब्रह्मांड को लेकर कई तरह की बातें पैदा होती है। जिसका जवाब हो या न हो कुछ तो ज्ञान व जानकारी हमें यह पुस्तक जरूर दे देती है। कई ऐसे सवालों का जवाब ‘‘क्या पृथ्वी गोल है या चपटी? मौसम कैसे बदलते हैं? जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई? पानी की सतह के नीचे हमें किन जीवों की उत्पत्ति का पता चलता?
ऐसे सवालों को जानने के लिए ऐतिहासिक तार्किकता आवश्यक है। डार्विन सिद्धान्तों के द्वारा भी यही प्रकाश डाला गया। आज का दौर भी आनुवंशिकी और विकास मूलक विज्ञान का दौर है। जो बदलाव चाहता है। मिथकों को नहीं नई प्रक्रिया को खोजना चाहता है। यह पुस्तक विज्ञान के विषयों को अन्य परिचयों को अलग ढंग से प्रस्तुत करती है। कोई भी परीक्षा से यह दावा तो निकाल सकते हैं। नदियों के पानी को पिया जा सकता है। उसे गंगा जल या आब-ए-जमजम कह कर पवित्र कहा जा सकता है। परन्तु सच में विज्ञान परीक्षण को मान्यता देता है। फिर चाहे हम कितना भी शोध कर ले। क्योंकि विज्ञान में निजी भावनाओं, लगाव या पसंद को निष्कर्षों तक पहुँचने की वैज्ञानिक विधि से विवेकपूर्ण कार्य लिया जाता है। अंततः कहा जा सकता है – इंसान जो सवाल पूछते हैं, जो जवाब तलाश करता है, जो जवाबों और सवालों के ताने-बाने से बदलाव बुनते हैं। जो ब्रह्मांड के नियमों को पहचान कर उन्नति के उस रास्ते पर चलना सीख जाते हैं। उसका सफर सिर्फ विज्ञान के माध्यम से ही पूरा हो पाया है। पुस्तक की भूमिका में जहां पुरुषोंत्तम अग्रवाल जी ने लिखी उनका भी मानना है- ‘गौहर रजा’ की यह पुस्तक वैज्ञानिक दृष्टि तथा मानवीय भावनाओं से होते हुए धर्म आस्थाओं, रीति-रिवाजों तथा तमाम उन मिथकों से दूर होते हुए हमें ब्रह्मांड की खोज तथा विज्ञान के अविष्कारों की सच्चाई के बारे में बताता है। पुस्तक को ‘गौहर रजा’ जी ने जिस तरह से पाठक की दृष्टि से अपने लेखन शैली को रुचिपूर्ण पकड़े रखा है। यह उनकी तार्किकता के तालमेल को दर्शाता है। पुस्तक में जहाँ छः अध्याय है, वही हर अध्याय एक नये वैज्ञानिक प्रक्रिया की जानकारी देती है।
डॉ. उषा