म्हैं तौ छोडूँ पण कांबल नीं छोड़ै
एक बार दो मित्र चाँदनी रात में नदी के किनारे घूम रहे थे। एक मित्र को अचानक पानी के बहाव में काला-स्याह एक कम्बल तैरता नज़र आया तो वह धीरज नहीं रख सका। लालची भी कुछ ज़रूरत से ज़्यादा था। कपड़ों सहित नदी में छलाँग मारी और कम्बल को बायें हाथ से पकड़ लिया। पर आश्चर्य कि दूसरे ही क्षण कम्बल उसे अपनी ओर खींचने लगा तो वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया – रीछ…रीछ…रीछ।
मित्र ने किनारे पर खड़े-खड़े ही सलाह दी – ”छोड़ दे…छोड़ दे। तब मित्र ने हताश होकर कहा – ‘’म्हैं तौ छोडूँ पण कांबळ नीं छोड़ै।’ वह तो छोड़ने को तैयार था, लेकिन कम्बल उसे नहीं छोड़ रहा था।
लालच में फँसने के बाद छुटकारा पाना आसान नहीं है। अपनी विकास यात्रा के दौरान मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान, धर्म, दर्शन,सम्प्रदाय और जाति-रिश्तों को आवश्यकतानुसार ईज़ाद किया, पर एक बार अस्तित्व में आने के बाद मनुष्य की तमाम सृष्टि ने कम्बल की नाईं उसे ही जकड़ लिया।
वह छोड़ना चाहे तब भी कम्बल उसे नहीं छोड़ेगा, उसे नोच-नोचकर निगल जाएगा। मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई भी पेशा चुनता है, किन्तु कुछ समय बीतने के बाद वह पेशा ही उसे अपने नागपाश में आबद्ध कर लेता है।
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(विजयदान देथा – तीन सौ तीन कहावती कहानियाँ’ से) सौजन्य – जयप्रकाश मानस