March 6, 2026

स्मृति के आगे स्मृतियां

0
WhatsApp Image 2026-01-07 at 9.55.00 AM

-दिवाकर मुक्तिबोध

सचमुच अद्भुत , अप्रतिम. यकीनन साहित्य की दुनिया में शायद ही ऐसा कोई उदाहरण होगा जब कवि पिता की चुटकी भर राख को उसका बेटा हर उस स्थान पर छिड़क देता हो जो उसके पिता को जीवन भर प्रिय रहे हैं, जहां उनके अपने लोग रहे है , जहां की धरती ने उनके जीवन को गढ़ा है, जन्म दिया है तथा सच्चा मनुष्य बनाया है. यह इसलिए भी अद्वितीय घटना है क्योंकि पिता ने शरीर का अंत होने के पूर्व, मृत्यु शैया पर मौखिक रूप से अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की हो अथवा इस आशय का कोई रुक्का या कोई पत्र छोड़ा हो ? ऐसा भी नहीं है. लेकिन इस तरह कुछ भी न होने बावजूद यदि ऐसा हुआ है तो यह एक पिता के प्रति बेटे का अटूट प्रेम, श्रद्धा व आदर के साथ ही उनकी स्मृति को उनकी अपनी स्मृतियों के साथ जीवंत रखने की वह घटना है जो हिंदी साहित्य की दुनिया में, कम से कम मेरी नज़र में, अनोखी है, बेमिसाल है, संतोषप्रद है और आनंददायक भी. पिता हैं विनोद कुमार शुक्ल और सुपुत्र शाश्वत गोपाल शुक्ल.

हिंदी के शीर्ष कवि, उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन 23 दिसंबर 2025 को हुआ. जीवित रहते तो एक जनवरी को 90 के हो जाते. वे करीब दो ढाई महीनों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे. जितने दिन भी वे अस्पताल में रहे , उनका यह एकलौता बेटा चौबीस घंटे उनके पास बना रहा. उनकी तीमारदारी में शाश्वत ने न दिन देखा न रात. इसके पूर्व भी जब विनोद जी स्वस्थ थे, लिखते थे, तब भी वह उनका सहारा बना हुआ था. वे जितना कुछ कागजों पर लिखते, शाश्वत उन्हें कम्प्यूटर पर टाइप करता था. और तो और विनोद जी जब कभी नागपुर अपनी बेटी के पास गए, उनकी हस्तलिखित कविताएं, कहानियां फैक्स के जरिए शाश्वत को भेज दी जाती थी. यहीं नहीं विनोद जी जब कभी बहुत अशक्ततता महसूस करते थे, लिख नहीं पाते थे तब वे बोलते जाते और बेटा उन्हें नोट करता था. बीते कुछ वर्षों से शाश्वत विनोद जी की किताबों की स्क्रिप्ट से लेकर उनके प्रकाशन की व्यवस्था देख रहे थे, मदद कर रहे थे. ऐसे ही एक दिन शाश्वत ने बताया कि विनोद जी करीब आधा दर्जन किताबें इस तरह छपीं और इतनी ही पुस्तकें अभी छपनी शेष है.

दरअसल राज्य सरकार की हिंदी ग्रंथ अकादमी में संविदा नियुक्ति में 13 वर्ष से अधिक की अवधि बीत जाने के बावजूद जब उन्हें पूर्णकालिक सेवा में नहीं लिया गया तब व्यवस्था से तंग आकर उन्हें वह नौकरी छोड़ दी. हालांकि इसके पूर्व उच्च स्तर पर प्रयत्न किए गए थे. पर वे विफल रहे. चिंतित विनोद जी चाहते थे कि बेटे की नौकरी पक्की हो जाए किंतु मारे संकोच के उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा. और अंतत: शाश्वत ने नौकरी छोड़ देना ही ठीक समझा. उनका यह निर्णय अच्छा ही रहा. क्योंकि विनोद जी को सहायक के रूप में बेटा मिला जिसने अपने पिता की हर तरह से देखरेख की, साहित्यिक कामकाज में उनका हाथ बंटाया, उनका संबल बना. बीते कुछ वर्षों में विनोद जी कि जितनी भी किताबें प्रकाशित हुईं, उनकी तैयारी में शाश्वत का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
समझा जा सकता है कि पिता के गुज़र जाने से शाश्वत को कितना खालीपन महसूस होता होगा.

शाश्वत अपने पिता की भावनाओं को न केवल समझते थे, बल्कि जीते भी थे. उनकी सोच कितनी गहरी है, इसकी तसदीक इस बात से होती है कि वे अपने पिता की राख को राजनांदगांव में प्रत्येक उस स्थान पर बिखेर कर आए जो विनोद जी का शहर था , जिससे उनकी गहरी आत्मीयता थी. स्मृतियां जुड़ी हुई थीं. इन स्थानों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनांदगांव दिग्विजय महाविद्यालय का वह प्राचीन महलनुमा मकान है जहां गजानन माधव मुक्तिबोध जी अपने परिवार के साथ रहते थे. मुक्तिबोध जी का उनके जीवन में क्या स्थान था, इसे वे अनेक दफे अपने संस्मरण में व्यक्त कर चुके थे. विनोद जी कहते थे कि वे कच्ची गीली
मिट्टी के लौंदे की तरह थे जिसे मुक्तिबोध जी ने आकार दिया. पिताजी से बीस साल छोटे विनोद जी स्वयं को मुक्तिबोध जी के परिवार का ही सदस्य मानते थे. शाश्वत ने उनकी एक चुटकी राख हमारे उस मकान के आसपास छिड़क दी. एक तरह से महाकवि मुक्तिबोध जी के चरण तले रख दी. कल्पना की जा सकती है कि उस समय वहां कितना अद्भुत भावनात्मक दृश्य उपस्थित रहा होगा. मृत्युपरांत एक कवि का अपने अग्रज कवि को श्रद्धांजलि अर्पित करने का ऐसा जीवंत उदाहरण और क्या हो सकता है जिसका माध्यम उनका बेटा बना.

नये वर्ष की पहली सुबह विनोद जी के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए मैंने शाश्वत को फोन किया था. फोन पर उन्हें सुनते हुए मैं चकित भी हुआ तथा भावुक भी. अपने पिता की स्मृति को राजनांदगांव में उनकी स्मृतियों में जीवित रखने का यह कितना अद्भुत विचार था. शाश्वत ने कहा – ” दादा की थोड़ी सी राख बचाकर रख ली थी. कल उसे राजनांदगांव के पुराने घर के आसपास, खेत, दादा का स्टेट हाईस्कूल का मैदान, रानी सागर तालाब, आप सबके घर त्रिवेणी परिसर के आसपास और मोहरा में शिवनाथ नदी के करीब जहां पूर्वजों के दाह संस्कार हुए हैं, वहां की मिट्टी में थोड़ी सी राख बिखेर दी थी. दादा हमेशा हर क्षण राजनांदगांव में ही रहे.अब पृथ्वी में रहेंगे. पूरा ब्रम्हांड उनका घर है ही. अभी बहुत छूटा छूटा सा, बहुत खाली सा लगता है.”

उनसे यह सुनने के बाद मैं आगे कुछ बोल नहीं सका. पर जानकर अच्छा लगा कि शाश्वत अपने पिता की प्रकृति एवं विचारों को समझते थे इसलिए उन्होंने उनकी स्मृतियां राजनांदगांव को समर्पित कर दी.

शाश्वत ने कहा- ” दादा नहीं है लेकिन मैं उनके सभी आत्मीयजनों से मिलता-जुलता रहूंगा.”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *