उदाहरण के जंगल में
जयप्रकाश मानस
बिना उदाहरण की कविता… न तुम्हारी न मेरी न और किसी की । हम सब एक उदाहरण के मुरीद।
उदाहरण से मुक्त न कवि न कविता न अर्थ! तो आप अनजाने में ही उस अद्वैत बिंदु को छू रहे हैं जहाँ सृजन और दृष्टा के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है।
हम जब भी कुछ समझना चाहते हैं, एक उदाहरण खोजते हैं। विज्ञान इसे ‘एनालॉजी’ कहता है और साहित्य इसे उपमा या रूपक।
लेकिन यह टिप्पणी उस परम स्थिति की खोज है जहाँ कविता स्वयं का उदाहरण बन जाती है।
उदाहरण पर पहचान के संकट और अस्तित्व के साक्ष्य तलाशने की हिम्मत हो तो आप भी कहना चाहेंगें – हमारा अस्तित्व एक विडंबना है।
आप तो जब कभी कहा करते हैं : हम एक उदाहरण।
यह परम सत्य है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो हम कार्बन के, डीएनए के और ‘ब्रह्मांडीय धूल’ के उदाहरण मात्र हैं। हमारी कोई भी भावना—चाहे वह प्रेम हो या पीड़ा—मौलिक नहीं लगती क्योंकि वह किसी न किसी पूर्व-स्थापित उदाहरण की पुनरावृत्ति है।
जब कवि कहता है : “मैं दुखी हूँ,” तो वह दुःख के उस वैश्विक उदाहरण का हिस्सा बन जाता है जिसे सदियों से लिखा गया है। यहीं से कविता की सीमा शुरू होती है। यदि कविता केवल उदाहरण बनकर रह गई, तो वह सूचना है, संवेदना नहीं।
कविता जब ‘तुम्हारी’ या ‘मेरी’ होती है, तो वह सीमित होती है। ‘निजी’ होना अक्सर ‘क्षुद्र’ होना है। लेकिन जब कविता ‘न तुम्हारी न मेरी’ के शून्य में प्रवेश करती है, तो वह ‘कलेक्टिव अनकॉन्शियस’ का हिस्सा बन जाती है।
वैज्ञानिक मर्म यह है कि ऊर्जा न तो पैदा की जा सकती है न नष्ट, वह केवल रूपांतरित होती है।
कविता भी वही रूपांतरित ऊर्जा है।
वह न कवि की संपत्ति है, न पाठक की।
वह उस ‘स्पेस’ की है जो दोनों के बीच घटित होता है। बिना उदाहरण की कविता वह है जो किसी ‘पूर्व-स्मृति’ की मोहताज़ न हो। वह एक ऐसी सिंगुलैरिटी है जहाँ समय और स्थान के नियम लागू नहीं होते।
उदाहरण से मुक्ति! क्या यह संभव है? आपकी पंक्ति कहती है: “उदाहरण से मुक्त न कवि न कविता न अर्थ!” यह एक वैज्ञानिक अनिवार्यता है।
भौतिकी में जैसे बिना ‘ऑब्जर्वर’ के ऑब्जर्वेशन संभव नहीं, वैसे ही बिना संदर्भ (उदाहरण) के अर्थ का जन्म असंभव है।
लेकिन, यहाँ एक सूक्ष्म पेच है। जब कविता अपने चरम पर होती है, तो वह उदाहरण देने के बजाय स्वयं अनुभव बन जाती है। पूर्ण सत्य यह है कि संसार में कुछ भी नया नहीं है, सब कुछ री-साइकिल हो रहा है। हम जो शब्द बोल रहे हैं, वे किसी और के हैं; जो भावनाएंँ महसूस कर रहे हैं, वे खरबों बार महसूस की जा चुकी हैं। तो फिर मौलिकता क्या है?
मौलिकता उस उदाहरण को ‘अ-उदाहरण’ बनाने की प्रक्रिया है।
भाषा विज्ञान के अनुसार, शब्द एक संकेत है और अर्थ उसका उदाहरण। यदि हम उदाहरण हटा दें, तो भाषा ढह जाएगी। लेकिन कविता का काम भाषा को ढहाना ही है ताकि उसके मलबे से सत्य झाँक सके।
बिना उदाहरण की कविता दरअसल वह ‘मौन’ है जिसे शब्दों के ज़रिए पकड़ने की कोशिश की जा रही है। विज्ञान में इसे ‘डार्क मैटर’ की तरह समझ सकते हैं जो दिखता नहीं, जिसका कोई उदाहरण नहीं दिया जा सकता, लेकिन जो पूरे ब्रह्मांड को थामे हुए है। अर्थ तभी तक जीवित है जब तक वह उदाहरण की परिधि में है; जैसे ही वह परिधि टूटती है, अर्थ ‘बोध’ में बदल जाता है।
हमारा जीवन एक ऐसा काव्य है जो किसी बड़े ‘मेटाफर’ (Metaphor) का हिस्सा है। हम पैदा होते हैं ताकि किसी परिभाषा को सिद्ध कर सकें। हम प्रेम करते हैं ताकि प्रेम के उदाहरण जीवित रहें। हम मरते हैं ताकि नश्वरता का उदाहरण बना रहे।
परंतु, वह कविता जो बिना उदाहरण की होने की ज़िद करती है, वह दरअसल ‘अहं’ के विसर्जन की कविता है। जहाँ कवि यह भूल जाता है कि वह लिख रहा है, जहाँ अर्थ यह भूल जाता है कि उसे कुछ समझाना है। वह एक शुद्ध ‘होना’ है।
अंततः, ‘न तुम्हारी न मेरी’ का भाव ही वह सेतु है जहाँ साहित्य और विज्ञान मिलते हैं। विज्ञान जिसे ‘लॉ’ (Law) कहता है, साहित्य उसे ‘लय’ कहता है। नियम और लय दोनों को उदाहरण चाहिए। लेकिन सत्य इन दोनों के पार है।
सत्य यह है कि हम उदाहरणों के जंगल में भटकते हुए वे मुसाफ़िर हैं जो एक ऐसी जगह की तलाश में हैं जिसका कोई नाम न हो, जिसकी कोई उपमा न हो। वह ‘बिना उदाहरण की कविता’ दरअसल ईश्वर का या फिर शून्य का दूसरा नाम है। दरअसल वह अर्थ से मुक्त है क्योंकि वह स्वयं ‘अस्तित्व’ है।
सृजन की पराकाष्ठा यह नहीं है कि आप एक महान उदाहरण पेश करें, बल्कि यह है कि आप स्वयं को एक ऐसे पारदर्शी माध्यम में बदल लें जहाँ से सत्य बिना किसी ‘फिल्टर’ या ‘उदाहरण’ के गुज़र सके। जब ‘मैं’ और ‘मेरा’ समाप्त होता है, तभी वह कविता जन्म लेती है जो न तुम्हारी है न मेरी।
वह केवल ‘है’।