March 6, 2026
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तुम्हारी यादों की
लहलहाती फसल में
बिजूका सी खड़ी थी मैं

अपनी सघन अनुभूतियों की
पकी फसल के साथ

उस रोज अचानक-से तुम आये
किसी प्रवासी पक्षी की तरह
मेरे मस्तक पर
दे स्नेहिल स्पर्श
गायब हो गए

तब-से आज तक
बिजूका-सी खड़ी हूँ मैं

कितनी फसलें यादों की पकी
कितने अंकुर फूटे
कुछ पता नहीं
कुछ पता नहीं !!

– अनिला राखेचा

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