बिजूका
तुम्हारी यादों की
लहलहाती फसल में
बिजूका सी खड़ी थी मैं
अपनी सघन अनुभूतियों की
पकी फसल के साथ
उस रोज अचानक-से तुम आये
किसी प्रवासी पक्षी की तरह
मेरे मस्तक पर
दे स्नेहिल स्पर्श
गायब हो गए
तब-से आज तक
बिजूका-सी खड़ी हूँ मैं
कितनी फसलें यादों की पकी
कितने अंकुर फूटे
कुछ पता नहीं
कुछ पता नहीं !!
– अनिला राखेचा