पं. दानेश्वर शर्मा जी की चतुर्थ पुण्यतिथि के अवसर पर डॉ. बलदेव जी का विशेष आलेख
लोकप्रिय कवि दानेश्वर शर्मा
डाँ.बलदेव
अपारे काव्य संसारे कविरेकः प्रजापतिः
यथास्मै रोचते विश्वं तथेदवं परिवर्तते ।
अग्नि पुरान के ये बात हर ककरो बर लागू होवय के झन होवय , फेर हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के लोकप्रिय गीतकार दानेश्वर शर्मा के उप्पर सोरा आना सही उतरथे । उन हर मौसम म छन्द लिखथें । उँकर अभिमंत्रित छन्द म रूमझुम चउमास , राईं – झुईं सरद , गमगमावत बसन्त अउ कड़कड़ावत घाम के दिन दउड़त चले आथे , बस कवि म बाँह पसारे के हुमक भर होवय ।
दानेश्वर शर्मा के कविता म राष्ट्रीय चेतना छन्द – छन्द म व्यक्त होय हे । उन बलिदानी पुरुस मन ल स्रद्धा के फूल चढ़ा के पन्द्रह अगस्त ल संकल्प – दिवस मानथें अउ आजादी के सुरूज के अँजोर ल चारों दिसा म फैलाय के आकांक्षा रखथें । शर्मा जी ओह मन ल सनमान के लाइक समझथे जेमन देस हित बर तन – मन – धन निछावर करथें –
बिपत कसउटी जोन कसाथे , तोन चढ्य परवान ।
उँकरे बर सब आदर सरधा उँकरे बर सनमान ।
तुलसी अउ रतना ल शर्मा जी भारतीय जीवन दरसन के परान समझथें । रतना के बोली ठोली ल समझ के तुलसी राम – दरस बर निकल जाथे अउ अपन मुक्ति के संगे – संग जन – कल्यान बर रमायन लिख देथे –
कासी अउ अजोध्या म तब ग्रंथ लिखिस तुलसी
चारों बेद छहों सास्तर मथ – मथ सार ल
लेवना साँही मड़ा दिस लिख के रमायन ल
कोनो कवि पाइन नहीं तुलसी के पार ल ।
‘ गुरु नानक ‘ म शर्मा जी मेहनत के रोटी के महिमा बतायें अउ नानक के जीवन म ‘ सियाराम मय सब जग जानी ‘ के उक्ति ल चरितार्थ होत देखा देथे । शर्मा म देस – प्रेम के संगे संग राजनीति के घलाव प्रखर चेतना हे । उन राजनीति के विडंबना ले वाकिफ हवँय फेर एकर समाधान तोड़ – फोड़ नइ करके सान्त चित्त ले करथें । उन जानथें के भ्रष्ट नेता अउ अफसर मन बर गाली गलौज असर नइ करय | अइसन बिगड़ैल मन ल उन सेल्यूकस अउ चंद्रगुप्त के पाछू – पाछू चाणक्य करा ले जायें । आसन देहे के पाछू चाणक्य बरत दिया ल बुता देथे अउ दूसर दिया ल बार देथे । उन चाणक्य के जुबानी एकर मरम ल घलो बताथँय –
पहिली दिया म सरकारी पइसा के तेल भरे हे
दूसर म मोर कमइ के पइसा के तेल भरे हे
तुमन आएव ओतका बेर करत रेहेंव सरकारी काम
लेकिन मिलना जुलना तो निजी बात है , निजी काम
शर्मा जी समूह के ताकत के जय गान करथें । उन कथें के जुरमिल के काम करे म हम पथरा म पानी ओगरा सकत हन । उँकर बिचार म बादर , भुइँया , चन्दा , सुरूज एक्के ठन आँय त रिस्ता – नता हर दू ठन काबर होही ? देसवासी मन बर उँकर सुन्दर संदेस हे –
रहिबो जिहाँ उही अँगना ह सरग असन रूपसाही
सुख के बिरछा रोज घनाही , दुःख के ह पतराही ।
दानेश्वर शर्मा आत्म विसवास के कवि आय । उनमा कुंठा , डर , त्रास नइये । इँकर जगा उल्लास , उमंग अउ साहस है । एकरे बर , उन बधवा , हिरना अउ फूल के चरित्तर ल मनखे के जीवन म उतारे के मनतब रखथें ।
बघवा साँही रुतबा राखव , हिरना कस मेछरावव ।
ये जिनगी त जीयें खातिर फूल सहीं मुसकावव ।
छत्तीसगढ़ी के गीति रचना म दानेश्वर शर्मा के बड़ उँच्च जगा हवय । उँकर गीत म पोगरी मया पीरा के संगे – संग संपन्न अउ सुखी परिवार के चित्रन घला मिलथे । उन गिन – गिन के एक – एक झिन नता – गोता के सोर – पता लेथें । ए परबित्ती हर उन ला आने रचनाकार मन ले भिने किसिम के चिन्हारी देथे । नोनी – लइका कुछू जाने लाइक होइस , त वोकर ले सेन्दुर भराए के अउ ओकर संग दनन – दनन रेंगे के साथ करे लागथे फेर पठउनी होइस त घर – गिरस्ती के अलकर फाँदा म फँस जाथे । दू उन पहिरती अउ दृ ठन धरवँट लुगरा म दिन- बासर काट देथे फेर सुदिन म एकेच रंग के सुध्धर लुगरा – पोलका लेये के गोहार करथे । वो ह जँवारा मितान संग मड़ई मेला जाके छोटे बाबू बर तुतरू लेहे के , नोनी बर कान के तितरी लेहे के अउ अपन धनी बर बंडी बिसाए के साध करथे । पटुका , बंडी , फेंटा पहिरे जोड़ी वोला निक लागथे अउ वोकर बिना जिनकी ह बिरथा । शर्मा जी के गीत रचना म गौरी कस भउजी अउ शंकर कस भइया हावय । भइया भउजी के मया म अरझे हे । ससुरार म छानी उप्पर होरा फोरइया देवर , बघनिन साँही सास अउ बड़ सिधवा ससुर हावँय ।
शर्मा जी विनोद प्रिय कवि आँय | उन तीस पैंतीस साल ले कवि – सम्मेलन के संचालन करत आत हें जिहाँ उँकर फुलझड़ी ले मंच अउ पंडाल दमदमात रइथे । शर्मा जी अपन खास नता मन बर घलोक खास ढंग के कविता लिखथें जिहां चपकनहा तारा कस सारा हे , कुँवारी के भरम पैदा करइया चार – चार लइका के महतारी परम पियारी सारी हे अउ रेंगतरहिन बजरहिन हे । ए सम्बन्ध मन म शिथिलता के जगा उछाह अउ उजास हे । शर्मा जी व्यक्तिगत जिनगी म घलो बड़ सुखी जीव आँय । उन ल दुःख हे तो सिरिफ बेटी – बिदा के , दहरा म मोती ल फेंके के । छत्तीसगढ़ी काव्य म शर्मा जी के ‘ बेटी के बिदा ‘ हर करुण शृंगार के अनुपम उदाहरण आय |
माई लोगन बर दानेश्वर शर्मा के हिरदे म बड़ भारी सन्मान हे । उन उँकर सहज सात्विक रूप अउ गुन दूनों के परसंसक आँय । उँकर नारी जतेक सुघ्घर अउ सुसील हे ओतके , कमेलिन हे । ‘ तपत कुरु ‘ कविता म उन सनन — सनन भाजी टोरइया पटेलियन ल गजब के कमौलिन बता के छत्तीसगढ़ी नारी के सुघ्घर झाँकी देखाय हें । छत्तीसगढ़ के माई लोगन बर बाहिर के कुछ लम्पट मन बने बिचार नइ रखँय जेमा खाखी बरदी वाले भक्षक – रक्षक घलो सामिल हैं । ‘ तँय चल ‘ सीर्सक अपना कविता म ए कवि हर एड़गा- बेड़गा मन ल सोझियाय बर सुघ्घर बेवस्था बना दे हवय | उन सेर ल सवासेर से भिड़ा देथँय । नारी मुक्ति के पक्षधर शर्मा जी कहिथे-
कुररी जस कलपत हस काबर
बघनिन साँही गरज ना
तोर मुलुक ये , तोर देस ये
काबर बिरथा डरना ?
शर्मा जी इतिहास अउ पुरान के संगे – संग दंतकथा ( लिजेंड ) घलोक ल अपन कविता के विस्य बनाथे । नारी के तियाग , बलिदान , परेम अउ सरबस समरपन के भावना ल उन ‘ तिलमति चाँउरमति ‘ के कहिनी म बड़ मोहक ढंग ल पेस करे हें । सौतिया डाह म रानी मन तिलमति ल कुँआ बउली म ढकेल देथें । फेर , वो मरय नहीं , चिरई बन जाथे । छुद्र जोनि पा के घंलो वोकर संसो राजा के जेवन – खान अउ घोड़ा – बछरू के दाना – पानी बर रहिथे । राजा के संगे संग जीव – जन्तु बर तिलमति के मया – पीरा बड़ अलहाद कारी हे । अइसने , महभारत के सब ले जादा कोंवर घटना के रूपक बर शर्मा जी लोक सैली म पाँच ठन जउन गीत लिखे हैं , वो हर उँकर गंभीर चिन्तन के परकासन आय । आज के सभ्य समाज के आगू उन ए दुखद परसंग ल रखे बिन नइ छोडँय –
परासर अपराध करिस अउ भुगतिस देवबरत ह
सतवत्ती के रोस अकेल्ला झेलिस देवबरत ह
पुरुस जात के असली बाना राखिस देवबरत ह
गंगा महतारी के बेटा बाजिस देवबरत ह
नितत्व सास्तर के मुताबिक एहर अब्बड़ मुस्कुल अउ अस्वाभाविक बूता आय , येकर बर कवि के इसारा काफी हे-
नर बिन नारी , नारी बिन नर , कभू न होइन पूरा
देववरात भीखम के जिनगी बीतिस आधा – अधूरा ।
असल म , पारासर के अपराध , सतबती के जिद भरे बदला के भावना अउ सान्तनु के काम – वासना ह महाभारत के बिनास के कारन आय ।
.’छत्तीसगढ़ महतारी ‘ कविता म शर्मा जी पुरान , इतिहास अउ वर्तमान के महिमा ल मंडित करके अनियायी मन बर सक्ती सरूपा छत्तीसगढ़ महतारी के चंडी रूप के पूजा करथे । उन महतारी के करजा उतारे बर अउ दूध के पत राखे बर संकल्प लेय हें । दुरुग – भिलाई म बइठे बइठे शर्मा जी ह छत्तीसगढ़ के सुगन्ध ल देस बिदेस म बगराए हे , तेकर लेखा – जोखा करे के दिन आ गेहे । सरकार अउ बिस्वविद्यालय प्रतिभा के मूल्यांकन करँय ।
ए काव्य संकलन ‘ तपत कुरु ‘ ह शर्मा जी के दीर्घ अनुभव संसार के सहज उद्गार आय अउ उँकर प्रतिबिंब ल देखे – परखे बर एकदम निरमल दरपन आय । उँकर गीत मन उँकरे आगू म लोक गीत के रूप में तब्दील हो चुके हैं । कवि – कर्म के उंकर ले बड़े सफलता अउ सारथकता अउ का हो सकत हे ? फेर , अतकेच हर उँकर सीमा नोहय । उन जिनगी के जटिलता घलोक ल नवा सिरा ले सरल बनाए के कोसिस करथें । एमा उँकर बिसद अध्ययन , इतिहास – पुरान के नवा रकम ले व्याख्या अउ भागवत धरम घलो सामिल है । उन छत्तीसगढ़ी समाज के बड़ जागरूक अउ जुम्मेदार कवि लेखक आँय । समय उँकर लेखनी ले ‘ लोक दर्शन ‘ के रूप म जउन चिन्तन परगट होत हे , वो हर जन कल्यान के दृष्टि ले बड़ महत्वपूर्ण है ।
भिलाई के धमन भट्ठी म तपे कुन्दन कस काया अउ सुरुजमुखी कस हँसमुख दानेश्वर शर्मा के रचना के लोकप्रियता के एक कारन तो उँकर जानदार भासा हे अउ दूसर उकर विनोद प्रियता उन सारा सारी , भइया भउजी , सास – ससुर भर मन ल विनोद के पात्र नइ बनाय , बल्कि जगत माता पारबती अब लक्ष्मी लोक ल सामिल कर लेथँय । उँकर खेल म तपत कुरु का मिट्टू भर नइये , किसन कन्हैया घलो हवय शर्मा जी के लेखन हर न तो प्रतिक्रिया आय अडन हलका – फुलका चिन्तन उन निषेध के कवि मोहैय । उकर लोक रंजकता के संगे संग छन्द अउ अलंकार घलोक के प्रति रुझान हे जेकर कारन उकर काव्य संसार हर बड़ सरस हो गे हे । ए संग्रह म लक्ष्मी के गोठ , अनपुरना गउरी , लेवना – चोरी , चन्दा लेहूं जइसन रचना म म रीति कालीन कविता के परभाव स्पस्ट है । बिसय जुन्ना हावय तभो ले कुछ न कुछू नवा दिखथे । चतुरानन बाप , पंचानन आप , षडानन अउ गजानन बेटा जइसन छन्द संस्कृत म मिलथे अठ रीति काल म घलोक फेर इहाँ गडरी ल अनपुरना के रूप में तब्दील कर दिए गए हे । अइसने सूर के चन्द खिलौना लेइहो मझ्या अउ तुलसी ‘ ससि माँगत आरि करें ‘ के सुघ्घर अवतरन छत्तीसगढ़ी म होय हे । व्यतिरेक के एक ठन सुघ्घर उदाहरन देखा-
दाई किहिस बेटा तोरो मुँह हावय चन्दा जस
ओकर ले दू बाँटा तहीं चमकत हस
वो कर तो पंचाइत हे , कभी उवय , कभू , बूड़य
चौबिस घंटा सोन्ना साँही तहीं चमकत हस ।
संस्कृत म वक्रोक्ति के बड़ चलन रिहिस । एक समे तो वक्रोक्ति जीवितम् कहि के वोकर महत्ता दिखा गय रिहिस । रीति काल म घला एकर जबरदस्त परयोग मिलथे । किसन – राधा के गोठ के रूप बिधान ल समझे बर एक उन उदाहरन लेवा-
अंगुल्या कः कपाटं प्रहरति कुटिलः माधवः किम्
नो चक्री किम कुलालः नहि धरणीधरः किम
द्विजिह्वः फणीन्द्रः
नाहं घोराहिमर्दी किमुत खगपतिः नहि हरिः किम्
कपीशः
चेत्थं राधा वचोभिः प्रहसति वदनं पातु वः
चक्रपाणि : ( संस्कृत )
खोलो तु किवार , तुमको ह एतबार
हरिनाम है हमारे बसो कानन पहार में ( ब्रज )
संस्कृत अउ ब्रज के ये चमत्कार हर सीमित रूपक म हय फेर छत्तीसगढ़ी में दानेश्वर जी के कलम जादा रूपक अउ जादा सरस बन गये हे । पीटथँव कपाट तभो चिटपोट करय नहीं …. | अइसने लछमी – पारवती गोठ म यमक अउ श्लेष वक्रोक्ति के सफलतम प्रयोग होय है । ये हर ये बात के परमान आय के काव्य के दृष्टि ले अवधी अउ ब्रज जइसन अभिव्यंजना सक्ती छत्तीसगढ़ी म घलोक हे हाला के ये हर अभी विकाससील भासा आय ।
पं. दानेश्वर शर्मा की किताब की भूमिका
जनवरी 1999 – भूमिका ●प्रस्तुति:-बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30 कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़ ,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396