March 6, 2026
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जब तक उस कोठरी नुमा कमरे में , जिसे आयोजक ग्रीन रूम कह रहे थे , चाय का तीसरा कप आया तब तक मेरे सब्र का बांध टूट चुका था।
” अब और कितनी देर है। सब लोग तो आ चुके हैं जिन्हें मंच पर बैठना है , अब किसका इंतज़ार है। ” मैने खीज कर आयोजक भोला बाबू से पूछा।
दअरसल मैं कार्यक्रम के निर्धारित समय पर पहुंच चुका था। मेरे सामने ही भोला बाबू भी हांफते हुए पधारे थे। ” घर चला गया था , कपड़े बदलने । ” उन्होंने दलील दी। साथ ही यह भी सुनिश्चित कर लिया मुझे आकर ज्यादा देर नहीं हुई है। फिर उन्होंने ही ग्रीन रूम में बैठने का आग्रह किया और कहा कि बाकी अतिथि भी आ ही रहे हैं।
उस कोठरी नुमा कमरे में, जिसमें न रोशनी ठीक से थी और न ढंग की हवा, चार पांच कुर्सियां पड़ी थीं। उन्हीं में से एक पर मै जम गया। जम गया इसलिए क्योंकि उसकी गद्दी इतनी अजीब थी कि एक बार बैठा तो अंदर धंसता ही चला गया।
आयोजक भोला बाबू ने हमारी देख रख करने के लिए मुकेश नाम के प्राणी को लगा दिया था जो हमें बाहर हॉल का और आने वाले अतिथियों की लेटेस्ट लोकेशन का आंखों देखा हाल सुना रहा था। कार्यक्रम के मंच के अतिथि भी तो काफी थे। मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, अति विशिष्ट अतिथि , मुख्य वक्ता, अध्यक्ष, विशेष सानिध्य , निमंत्रण पत्र नामों से भरा पड़ा था। सब एक एक करके अवतरित हो रहे थे। सबके चेहरे पर भाव रहता ” अरे अभी कार्यक्रम शुरू नहीं हुआ ” और मुकेश उनके सम्मान एक चाय और बोल देता। थोड़ी थोड़ी देर में पानी की बोतलें घुमा देता।
अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता करने वाले देवी प्रसाद जी भी आ गए जिनके बारे में मुकेश कह रहा था कि उनका तो एक घंटा देरी से ही आने का रिकॉर्ड है।
चाय का तीसरा कप समाप्त हुआ ही था कि ” आ गईं , आ गईं ” का शोर हुआ। भोला बाबू भी प्रसन्नता से लबरेज अंदर आए और बोले ” कोमल जी आ गईं , अब हम कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं। ”
मैने निमंत्रण पत्र को दोबारा ध्यान में लाने की कोशिश की , मुझे याद नहीं आया कि उसमें किन्हीं कोमल जी का नाम था। मेरे चेहरे को भांपते हुए आयोजक महोदय बोले ” कोमल जी , आज के कार्यक्रम की संचालिका हैं।बहुत पॉपुलर संचालिका हैं।”
” अरे बहुत बढ़िया बोलती हैं। आप सुनिएगा तो मज़ा आ जाएगा। ” मुंह में पान चबाते और उसके रस की वर्षा मेरे कुर्ते पर करते हुए अध्यक्ष देवी प्रसाद जी बोले।
कोमल जी ग्रीन रूम में अवतरित हुई तो ऐसा लगा मानो परफ्यूम की शीशी ढुल गई हो।
“माफ कीजियेगा। पार्लर में देरी हो गई। कितना कहा जल्दी करो जल्दी करो लेकिन वो तो अपना पूरा काम करके ही मानते हैं। प्रणाम बाबूजी” कोमल जी ने कहा और देवी प्रसाद जी को अभिवादन किया।
” कोई बात नहीं बेटा। हम सब भी तो अभी ही आएं हैं। ” देवी प्रसाद जी ने हम सबकी तरफ से कोमल जी को देरी के लिए क्षमा कर दिया।
” कार्यक्रम कोई भी हो कोमल जी पार्लर जाकर ही आती हैं कार्यक्रम में। ” मुकेश मेरे कान में फुसफुसाया ।
” मैं मंच पर जाती हूं और फिर एक एक करके आपको आमंत्रित करती हूं। ” कोमल जी बोलीं और मंच पर चली गई।
कोमल जी मंच पर गईं तो ऑडियंस ने जोरदार तालियों से उनका स्वागत किया । इससे उनकी लोकप्रियता एक बार और सिद्ध हो गई। फिर उन्होंने माइक वाले को हिदायते देना प्रारंभ किया । माइक टेस्टिंग में उन्होंने दस मिनट निकाल दिए।माइक से संतुष्ट होने के बाद उन्होंने अपना संचालन प्रारंभ किया। हर अतिथि को वो अच्छी खासी लंबी भूमिका और एक दो शेर कहने के बाद बुला रही थीं। उसके साथ ही ऑडियंस को तालियां बजाने के लिए प्रेरित कर रहीं थी। अब वो तालियां अतिथियों के लिए थीं या कोमल जी के शेरों के लिए यह कहना कठिन था। मेरे साथ बैठे अतिथि विनय जी ने मेरे कान में फुसफुसाकर कहा ” लगता है आज कान्हा का पूरा जंगल खाली हो गया हैं। सारे शेर तो कोमल जी ने यहीं मार दिए। ” उस गंभीर सभा में भी मेरी हंसी छूट गई।
औपचारिक स्वागत, कार्यक्रम की भूमिका के बाद हर वक्ता का परिचय देने के लिए भी कोमल जी अच्छा खासा समय ले रही थीं। मज़े की बात यह थी कि इस अतिथि परिचय में वो ज्यादातर अपने बारे में या दिवंगत साहित्यकारों के बारे में ही बोल रही थीं। मेरे पास बैठे विनय जी फिर फुसफुसाए, ” अगर पढ़ना नहीं थे तो हमारे परिचय मंगवाए ही क्यों गए। सभी कुछ तो वो अपने मन से ही बोले जा रही हैं।” मैं उनका कुछ उत्तर देता तब तक मेरे नाम की उद्घोषणा इस परिचय के साथ हुई” अब आपको कौन नहीं जानता। आपका परिचय देना यानी सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। हिंदी साहित्य जगत में मुंशी प्रेमचंद के बाद आपका ही नाम आता है। ”
जब कोई सूरज को दीपक दिखाने वाला वाक्य बोलता है तो आपको समझ जाना चाहिए कि उसे आपके बारे में कुछ नहीं पता। मेरे साथ बैठे विनय जी फुसफुसाकर बोले ” ज़्यादा खुश मत होइए, पिछली बार गोवर्धन जी के लिए भी इसने यही कहा था। उसे हिंदी साहित्य में सिर्फ मुंशी प्रेमचंद का ही नाम मालूम है। ”
तभी कोमल जी के शब्द मेरे कानो में पड़े जिनमें नाम तो मेरा था पर वो जो किताबें बोल रही थीं वो मेरी नहीं थी।
” ये किताबें मैने नहीं लिखी है “मैने कहना चाहा तो विनय जी मुस्कुरा कर बोले ” नहीं लिखी हैं तो लिख लीजिएगा। अब उन्होंने कह दिया है तो आपको लिखना ही पड़ेगा। ”
मैं उनकी बात का कोई उत्तर सोच पाता कि मुझे सुनाई दिया
” इनके कद का कोई क्या करेगा अंदाज
ये आसमान है फिर भी सिर झुकाए बैठा है।”
अपने परिचय में मै ये शेर न जाने कितनी बार सुन चुका था। लेकिन ऑडियंस ने फिर भी तालियां बजाई।
भाषण समाप्त करके आया तो साथ बैठे विनय जी ने कहा” आप तो बड़ी जल्दी लौट आए। कम से कम उतनी देर तो बोलते जितनी देर इन देवी जी ने आपके वक्तव्य की प्रस्तावना दी थी। ”
” क्या करते , सारा समय तो ये ही लिए जाती है प्रस्तावना देने में।” मैने कमजोर ही सही , प्रतिवाद किया।
” ठीक है , अब हम ही निबटते हैं इनसे। ” कहकर वे उठे और सीधे कोमल जी के पास पहुंचे। कोमल जी अगले वक्ता की भूमिका बनाने में व्यस्त थी। विनय जी ने उन्हें टोकते हुए कहा ” कोमल जी आप बहुत अच्छा बोल रही हैं। लेकिन वो क्या है कि हम लोग भी थोड़ा बहुत पढ़ लिखा कर आए हैं । तो हम लोग बोल लें दस दस मिनट , फिर आप बोलती रहिएगा आराम से। ”
इस वाक्य से कोमल जी का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने चेहरे के भाव बदले और मुस्कुराते हुए अगले वक्ता को बुलाया।
दो घंटे चलने वाला कार्यक्रम साढ़े तीन घंटे चला। कहना न होगा कि उसमें ज्यादातर समय कोमल जी ने लिया था।
कार्यक्रम के बाद आयोजक भोला जी प्रसन्न थे, कहने लगे “कार्यक्रम निर्विघ्न हो गया। विशेष बात कि कोमल जी का संचालन बहुत अच्छा रहा।क्या है कि उनके संचालन से कार्यक्रम में जान आ जाती है।”
मैं पशोपेश में था। पूछना चाहता था कि मेरा जो परिचय लिखकर दिया था वो भोला बाबू ने कोमल जी को दिया था या नहीं। लेकिन लगता था कि उसका कोई फायदा अब नहीं था। क्योंकि कोमल जी तो एक और कार्यक्रम का सफल संचालन कर अपने प्रशंसकों के साथ सेल्फी खिंचवाने में व्यस्त थी। भोला बाबू भी उनके साथ एक एक्सक्लूसिव तस्वीर खिंचवाने की आतुरता में थे। ऐसे में सम्मान में मिली शॉल, स्मृति चिन्ह और बुके उठा कर घर की राह लेना ही श्रेयस्कर था।

सच्चिदानंद जोशी

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