06 अक्टूबर : तीसरी पुण्यतिथि “डॉ. बल्देव : एक जीती-जागती संस्था”
बहुत से व्यक्ति किसी विधा-विशेष में दक्ष होते हैं, उन्हें हम उनकी विशेष विधा के कारण पहचानते हैं। कुछ व्यक्ति...
बहुत से व्यक्ति किसी विधा-विशेष में दक्ष होते हैं, उन्हें हम उनकी विशेष विधा के कारण पहचानते हैं। कुछ व्यक्ति...
24/09/2021 मेरी "दास्तान" को न छेड़ मेरे हमदम दर्द बहुत है इस इश्क़ का किस्सा भी मुझे "मशहूर" लगता है...
मोहन राकेश जी का यह नाटक अपने पहले मंचन(1969) से ही चर्चित रहा है.तब से अब तक अलग-अलग निर्देशकों और...
तटस्थता का इतिहास, उसके गद्दार होने की गवाही में साबित हो चुका है। इस पर हमारे समय के कई महत्वपूर्ण...
मैं ज़ख़्म दिल का दिखाऊँ कैसे? कहानी ग़म की सुनाऊँ कैसे? गले किसी को लगाऊँ कैसे? क़सम तुम्हारी भुलाऊँ कैसे?...
शायरी की परंपरा बहुत पुरानी है और काफी मथी जा चुकी है।फ़ारसी-उर्दू-हिंदी की यह परम्परा मुसलसल जारी है, और लोकप्रिय...
भारतीय नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम नार्वे और स्पाइल दर्पण पत्रिका नार्वे के संयुक्त तत्वावधान में मुंशी प्रेमचंद जयंती के...
धूप और छाँव ये मेरा गाँव, तालों पर चलता, ये डगमग नाँव, बरगद का पेड़, तालों का किनारा, शाम जहाँ...
बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन 122 122 122 122 ग़ज़ल _ 1 -------------------------------- तुम्हें कुछ ख़बर है...
(1) रूप तेरा बहुत सलोना है, चाँद को शर्मसार होना है। हाथ नाजुक तेरे सुकोमल से, और मासूम दिल का...