छत्तीसगढ़ी कविताओं में होली
वसन्त ऋतु की मस्ती और मादकता की पराकाष्ठा को ही मैं होली मानता हूँ। धार्मिक मान्यताओं के साथ ही प्रकृति...
वसन्त ऋतु की मस्ती और मादकता की पराकाष्ठा को ही मैं होली मानता हूँ। धार्मिक मान्यताओं के साथ ही प्रकृति...
डॉ. मृणालिका ओझा लोक साहित्य को किसी भी अंचल की भाषा या सीमा में समेट कर नहीं रखा जा सकता।...
(मेरे संकलन से - अरुण कुमार निगम) पं. दानेश्वर शर्मा का अध्यक्षीय भाषण : दिनांक : 21 जून 1962 संदर्भ...
लेखक - डॉ. हनुमंत नायडू { नवभारत टाइम्स , बम्बई (अब मुम्बई) दिनांक 03 मार्च 1968 से साभार } मध्य...
(कल से लेकर आज तक) भारतवर्ष में तीन मुख्य ऋतुएँ ग्रीष्म, वर्षा और शीत होती हैं। चार उप-ऋतुएँ भी होती...
कुछ रिश्ते बिछड़ कर भी छूट जाते है सीने में इस तरह सूरज डूबने के बाद भी लाल रंग रिसता...
(आलेख - स्वराज करुण ) देखते ही देखते आज नौ साल पूरे हो गए. वह 2मार्च 2016 की तारीख़ थी,जब...
प्रदेश सरकार द्वारा बस्तर की विशिष्ट जनजातीय कला एवं संस्कृति को पुनर्जीवित करने तथा समुचित सम्मान दिलाने के उद्देश्य से...
ऋतुराज की प्रतीक्षा करना बसंत कोई मौसम परिवर्तन नहीं वह पावन सुगंध है तुम्हारे ख़ुशरंग मन की जिसे तुम बिखेर...
पूस धुँधरा,कोहरा अउ ठुठरत जाड़ ल गठियाके जइसे ही जाय बर धरथे,तब माँगे महीना माँघ बसंती रंग के सृंगार करे...