हे शुष्क शाख़ पर बैठे खग…
हे शुष्क शाख़ पर बैठे खग! क्या सोच रहे यूँ एकाकी? मेघों की श्यामल घटा घिरी, हर ओर दीखती हरियाली।...
हे शुष्क शाख़ पर बैठे खग! क्या सोच रहे यूँ एकाकी? मेघों की श्यामल घटा घिरी, हर ओर दीखती हरियाली।...
अभी तक बारिश नहीं हुई ओह! घर के सामने का पेड़ कट गया कहीं यही कारण तो नहीं बगुले झुँड...
कोई कविता कुछ भी सिद्ध नहीं करती, सिवाय एक अनुभव को रचने के मैंने भी यही एक प्रयास किया है...
खोज रहे जन मिले कहीं से, रोटी दो जून। रहे न खाली हाथ एक भी, सबको हो काम। घर की...
अब हम निःशब्द एक दूसरे को ताकते हैं आंखों के उजड़े अरण्य में हर तरफ बिखरी है जुगनुओं की मृत...
बुकर पुरस्कार से सम्मानित अरुंधति रॉय को निर्भीक और मुखर लेखन के लिए प्रतिष्ठित पेन पिंटर पुरस्कार से सम्मानित किया...
(डॉ. चेतन आनंद/Chetan Aanad) बात उस समय की है जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था. तब कविता लिखने का...
कल सुबह एक उपन्यास को पकड़ा और फिर ऐसा हुआ उस उपन्यास ने मुझे पकड़ लिया और तब छोड़ा जब...
जाना कहां था कहां जा रही हूँ अब तक तो सबको संभाला है मैंने मगर मैं अब खुद ही बिखर...
डा. परदेशीराम वर्मा वीर शहीदों पर हम अपने समय के बड़े कवियों के लेखन में भी भावांजलियां कम पाते हैं।...