टूट रहीं हैं परतें!
विधा – कविता टूट रहीं हैं परतें विश्वास की दरक रहें है पहाड़ चोट खाकर बातों के भूकंप से ही...
विधा – कविता टूट रहीं हैं परतें विश्वास की दरक रहें है पहाड़ चोट खाकर बातों के भूकंप से ही...
हमारी पीढ़ी, जिसने युग को करवट लेते देखा है अपने पैरों चलकर जिसका स्वागत किया है, अभिभूत है ईश्वर की...
आओ हम सब नव वर्ष का स्वागत करते हैं। बीत गया वो साल पुराना जिसमे थी अंधियारी । कोहराम मचा...
नई उमंगें साथ लिए , नव वर्ष अब आया है। बहुत कठिन था साल पुराना, छायी थी अंधियारी । दुर्भाग्य...
अपने ही दर्द कम थे क्या जो पराये भी बाँट लिए? सबसे बेरहम दर्द खुद के लिए छाँट लिए! बनकर...
रस की धार अनंत बहती थी अंजुरी भर भर पीया हैं हमने प्रेम प्रकाश के छाँव तले जीवन मधुर जीया...
तुम्हारे विरह में झरती हुई इन नम आंखों की बूंदे तुम्हारे गुरूर से हमेशा बड़ी होंगी ...! तुम्हे बहुत गुरूर...
तुमने नदी को बोतल में पैक किया पहाड़ को खुदाई के औजारों में हवा को सिलिंडर में आकाश को बालकनी...
दिन की तासीर सर्द है कल शाम से सूरज को... भिगोया है बादलों ने और दूर शायद .. रुई के...
रूठे को मैं कैसे मनाऊं, होती जिनसे बात नहीं, यादों में मैं उनके तड़पू उनको मेरा ख्याल नहीं।। कोई जाकर...