सुनो ज़माना ख़राब है…
सुनो ज़माना ख़राब है चाहत है मेरी रख मैं आऊँ दो जलते दिए चौखट पर तेरी जिसके भीतर न जाने...
सुनो ज़माना ख़राब है चाहत है मेरी रख मैं आऊँ दो जलते दिए चौखट पर तेरी जिसके भीतर न जाने...
टिमटिमाते दियों से जगमगा रही है अयोध्या सरयू में हो रहा है दीप-दान संगीत और नृत्य के सम्मोहन में हैं...
दीवाली के दिन एक दीया रखवाना कदापि नहीं भूलती थीं माँ उस कमरे में जहाँ होते थे मिट्टी से बने...
जूतों के भीतर जो अंधेरा है उसमें सिर्फ पैर रास्ता देख पाते हैं पैरों के उनमें से निकल जाने के...
कंकाल हो जाना कला है। जीवन की मृत्युशय्या पर लेटे इच्छामृत्यु का वरदान नहीं मिलता। “अश्वत्थामा हतो हतः” — अर्धवाक्य...
निदा साहब आज ज़िंदगी की 87 वीं सीढ़ी पर खड़े होकर दुनिया को देख रहे होते ! उनकी यह ग़ज़ल...
हिन्दी नवगीत के प्रखर रचनाकार भाई भारतेन्दु मिश्र ने भी अपने लिए ज़िन्दगी का नेपथ्य चुन लिया। उन्हीं के एक...
कहते हैं मुग़लों के शासन-काल में भारतीय कामगारों को शुक्रवार के दिन छुट्टी दी जाती थी । बदमाश अँगरेज़ों ने...
जयप्रकाश मानस कुछ रंग बचे, कुछ रूप कुछ डाल बचे, कुछ पात बची कुछ धूप, बचे कुछ कूप। कुछ शब्द...
मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं, कुछ करने की अभिलाषा में मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं। मौके आए जाने...