’तारा’ : संजीव बख्शी का नवीनतम उपन्यास
सेतु प्रकाशन दिल्ली ’तारा’ संजीव बख्शी का नवीनतम उपन्यास है। पिछले वर्ष ही उनके दो उपन्यास ’ढाल चंद हाजिर हो’...
सेतु प्रकाशन दिल्ली ’तारा’ संजीव बख्शी का नवीनतम उपन्यास है। पिछले वर्ष ही उनके दो उपन्यास ’ढाल चंद हाजिर हो’...
तो फ़रवरी जा रहे हो तुम… कैलेंडर की दीवार से उतरते हुए जैसे कोई महीना नहीं, एक अनकहा संवाद विदा...
कितनी बदल चुकी है दुनिया भावना, संवेदना, सम्मान,, सबको कुचलती हुई बेलगाम राजनीति , और इसके कुचक्रों में फंसे लोग,,...
गणतंत्र की शक्ति बख़्तरबंद गाड़ियों से नहीं मापी जाती न ही बन्दूकों, विषों, या ग़ायब कर दिये जाने से। गणतंत्र...
टपक रहा छप्पर से पानी वह निर्मम बरसात लिखो। लिखो कहानी फिर हल्कू की पूस ठिठुरती रात लिखो। सिसक रही...
भरोसा था जिसपे दग़ा दे रहा है ये रहज़न नहीं रहनुमा दे रहा है जिसे देखो वो मशवरा दे रहा...
मैं चुपचाप खडा रहा दरवाज़े पर सिर टिकाए रोशनी, धूल और धुएं की तरह; मैं भी आना चाहता था घर...
कम-उम्र बदन से छरहरी लाई वसंत फिर, फरवरी। शायर कवियों का दिल लेकर शब्दों का मलयानिल लेकर गाती है करमा...
हर स्त्री के पास होते हैं कम से कम दो लोकगीत एक चौखट के पास बैठकर गुनगुनाया जाता है दिन...
पढ़कर -लिखकर आगे बढ़कर उन्नति की मैं, चोटी चढ़कर राष्ट्र का अरमान बनूँगा। बाबा मैं इंसान बनूँगा। नहीं बनूँगा डाॅक्टर...