पितृपक्ष में कवि : स्मृतियां श्रीकांत वर्मा की
~~~~~~~ जहां बीता था संघर्ष समूचा जहां बेआवाज़ हँसी फिसलती थी बारंबार भीतर ही भीतर सूखते थे दुःख जिन गलियों...
~~~~~~~ जहां बीता था संघर्ष समूचा जहां बेआवाज़ हँसी फिसलती थी बारंबार भीतर ही भीतर सूखते थे दुःख जिन गलियों...
( आदिवासी : गीत और स्वप्न पर कुछ कविताएँ) (एक) पहाड़ की गोद में एक बहुत पुराना टूटा ढोलक पड़ा...
किसी की प्रशंसा ,किसी की जलन है दुनिया का ये तो अनोखा चलन यहाँ तन से कपड़े उतरने लगे कहाँ...
ज़मीन को चाहे किसी भी पैमाने से माप लो उसका बँटवारा कभी नहीं होता सम-तुल्य। कहीं मौसम रंग बदल लेंगे,...
आज सुबह मैं चौंक गया जब सामने अलमारी में रखी किताबें धीमे-धीमे मुस्कुराने लगीं। कइयों ने तो अपने नन्हे-नन्हें हाथ...
"गरीबी, तू न यहाँ से जा" गरीबी ! तू न यहाँ से जा एक बात मेरी सुन पगली, बैठ यहाँ...
ज़ियादा की ख़्वाहिश कब की हमने,,, मगर तुम्हें या तुमसे इतना भी यदि नहीं माँगेंगे तो जीयेंगे कैसे,,, हमारे बालों...
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' क्वीन्स, न्यूयार्क के पुस्तकालय में वह मुस्कराते पढ़ रही थी और मैं पूछता कि पत्रिका मेरी...
मर्द भी मासूम होते हैं चेहरा सख़्त, दिल कोमल। हँसी झूठी, आँखें गीली। बोझ भारी, कंधे थके। रातें लंबी, सपने...
तनहाई की गहराई में , डूब रहा हूँ शोर के इस जहाँ में ,अब उब रहा हूँ। हर तरफ मची...