अभी तक बारिश नहीं हुई
अभी तक बारिश नहीं हुई ओह! घर के सामने का पेड़ कट गया कहीं यही कारण तो नहीं बगुले झुँड...
अभी तक बारिश नहीं हुई ओह! घर के सामने का पेड़ कट गया कहीं यही कारण तो नहीं बगुले झुँड...
खोज रहे जन मिले कहीं से, रोटी दो जून। रहे न खाली हाथ एक भी, सबको हो काम। घर की...
अब हम निःशब्द एक दूसरे को ताकते हैं आंखों के उजड़े अरण्य में हर तरफ बिखरी है जुगनुओं की मृत...
जाना कहां था कहां जा रही हूँ अब तक तो सबको संभाला है मैंने मगर मैं अब खुद ही बिखर...
दुनिया भर में आग लगी है, पानी चुप है। मुँह पर पट्टी बाँधे हैं ये सारी झीलें झरनों के हाथों...
दृश्यों को बुझाकर, मुँदी पलकों पर रखे गए चुम्बनों की तरह क्या किसी ने पृथ्वी को उसके स्पर्श से पहचाना...
बाँके सैंया अपने गोरे तन पे यूँ इतराते नंद जिठानी सँग मिलकर हम पर ताने बरसाते हमरे जियरा की काहू...
फलक़ पर मुस्कुराती बिजलियाँ कुछ और कहती हैं ज़मी पर लड़खड़ाती कश्तियाँ कुछ और कहती हैं बया करते हैं दरवाज़े...
वे जहां कहीं चले जाते हैं वहीं छोड़ जाते हैं शरीर से उठती गंध वही अंतिम गंध जिसमें उनके पसीने...
मनुष्य गिर जाता है भाषा अकेली नहीं गिरती उसके साथ गिर जाती है मनुष्यता की समूची विरासत कहते हैं कवि...