March 6, 2026

कविता

पितृपक्ष में कवि : स्मृतियां श्रीकांत वर्मा की

~~~~~~~ जहां बीता था संघर्ष समूचा जहां बेआवाज़ हँसी फिसलती थी बारंबार भीतर ही भीतर सूखते थे दुःख जिन गलियों...

नदी का पानी आदिवासी लड़की की हैँसी जैसा था

( आदिवासी : गीत और स्वप्न पर कुछ कविताएँ) (एक) पहाड़ की गोद में एक बहुत पुराना टूटा ढोलक पड़ा...

युद्ध सिर्फ़ सरहदों पर नहीं होते

ज़मीन को चाहे किसी भी पैमाने से माप लो उसका बँटवारा कभी नहीं होता सम-तुल्य। कहीं मौसम रंग बदल लेंगे,...

जनकवि कोदूराम “दलित” जी की हिन्दी कविता –

"गरीबी, तू न यहाँ से जा" गरीबी ! तू न यहाँ से जा एक बात मेरी सुन पगली, बैठ यहाँ...

तुम भी रखना पाँव मेरे गाँव –

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' क्वीन्स, न्यूयार्क के पुस्तकालय में वह मुस्कराते पढ़ रही थी और मैं पूछता कि पत्रिका मेरी...