April 23, 2026

कविता

पितृपक्ष में कवि : स्मृतियां श्रीकांत वर्मा की

~~~~~~~ जहां बीता था संघर्ष समूचा जहां बेआवाज़ हँसी फिसलती थी बारंबार भीतर ही भीतर सूखते थे दुःख जिन गलियों...

नदी का पानी आदिवासी लड़की की हैँसी जैसा था

( आदिवासी : गीत और स्वप्न पर कुछ कविताएँ) (एक) पहाड़ की गोद में एक बहुत पुराना टूटा ढोलक पड़ा...