अपने भीतर अवसादों को
अपने भीतर अवसादों को भोगूँ या फिर आह! करूँ। जिस जग ने मुझको ठुकराया उसका क्यों परवाह करूँ।। मेरे होने...
अपने भीतर अवसादों को भोगूँ या फिर आह! करूँ। जिस जग ने मुझको ठुकराया उसका क्यों परवाह करूँ।। मेरे होने...
पौधा कोई पतझर में भी सूखा न छोड़िए लौट आएगी बहार, यह आशा न छोड़िए माँगे की रोशनी का भरोसा...
तुम्हारे जन्म की तारीख और जगह नही जानती थी पर तब भी पता था कि इस दुनिया मे तुम हो...
आती और जाती साँसों के संघर्षों में हारकर इक दिन हम भी टंग जायेंगे फोटो बन दीवार पर. अभी पिताजी...
हे शुष्क शाख़ पर बैठे खग! क्या सोच रहे यूँ एकाकी? मेघों की श्यामल घटा घिरी, हर ओर दीखती हरियाली।...
अभी तक बारिश नहीं हुई ओह! घर के सामने का पेड़ कट गया कहीं यही कारण तो नहीं बगुले झुँड...
खोज रहे जन मिले कहीं से, रोटी दो जून। रहे न खाली हाथ एक भी, सबको हो काम। घर की...
अब हम निःशब्द एक दूसरे को ताकते हैं आंखों के उजड़े अरण्य में हर तरफ बिखरी है जुगनुओं की मृत...
जाना कहां था कहां जा रही हूँ अब तक तो सबको संभाला है मैंने मगर मैं अब खुद ही बिखर...
दुनिया भर में आग लगी है, पानी चुप है। मुँह पर पट्टी बाँधे हैं ये सारी झीलें झरनों के हाथों...