लक्ष्मीकांत मुकुल की दो कविताएं
विस्तृत है पिता पर्वत की तरह अटल हैं पिता जिसकी सीधी ढलान से पाए हैं हम ऊपर चढ़ने का हौसला...
विस्तृत है पिता पर्वत की तरह अटल हैं पिता जिसकी सीधी ढलान से पाए हैं हम ऊपर चढ़ने का हौसला...
हल भी चलाएं और बीज भी बोए । सबको खिलाए और हम भूखे सोए ।। कितने लाचार मजबूर है हम...
आओ हम सब योग करें, योग से दूर रोग करें आओ हम सबको जागरूक करें आओ हम 'योग से निरोग'...
योग के संयोग से आओ धरा को स्वस्थ कर लें आओ धरा को स्वस्थ कर लें। आन की है, शान...
योग के संयोग से आओ धरा को स्वस्थ कर लें आओ धरा को स्वस्थ कर लें। आन की है, शान...
1* कुछ भी तो भूलता नहीँ बस समय के चक्र में पीछे छूट जाता है दब जाता है कहीं मन...
नीम बेहोशी में खोई रहती हूँ सोई रहती हूँ देखती हूँ रोज़ एक स्वप्न ये दुनिया तबाह हो रही है...
दृष्टा तुम हो, सृष्टा तुम हो, परमपिता आशीष सम, इस जीवन के, विश्वास अटल , भ्रमित मन के, निर्मल उजास...
डॉ जे के डागर सुहाग रात की रात के बाद सुबह , कविता, जी मै चाय बना लाऊं, राजीव, नहीं...
1- साफ करो हाथों को मुझसे कोरोना को दूर भगाओ साबुन मुझको समझ न लेना प्यारे बच्चों नाम बताओ ।...