लौट आओ
लौट आओ आँसुओं वापस आँखों में अब समंदर में भी और जगह नहीं है खारेपन के लिये पहाड़ों ने भी...
लौट आओ आँसुओं वापस आँखों में अब समंदर में भी और जगह नहीं है खारेपन के लिये पहाड़ों ने भी...
(1) मत्त सवैया - मँय छत्तीसगढ़ के बेटा अंव मोर रग-रग मा संगीत बसे, मँय हरमुनियम के लहरा अंव मँय...
मैंने कब कहा कोई मेरे साथ चले चाहा जरुर! अक्सर दरख़्तों के लिए जूते सिलवा लाया और उनके पास खड़ा...
"खुमान-संगीत" यह शीर्षक ठीक वैसा ही है जैसे रवींद्र-संगीत। यह बात और है कि बंगाल ने रवींद्र-संगीत को मान्यता प्रदान...
"मोर संग चलव........" (भाग - 1) इन तीन शब्दों के साथ ही कवि-गीतकार-गायक लक्ष्मण मस्तुरिया की साँवली-सलोनी सूरत आँखों के...
कविता रोज लिखते हैं मन में आए इतना लिखते हैं लेकिन क्या सच में हम कविता लिखते हैं। बहुत दिनों...
जीवन के सफर मे पक्के, चमचमाते रास्ते कम ही मिलते है ! अक्सर मिलती है अजनबी पगडंडियाँ उबड़- खाबड़ सी.....
मैं कुछ वर्षों तक सागर में था। वहां एक मिठाईवाला है। वैसी गुजिया बनानेवाला पूरे मुल्क में कहीं भी नहीं...
एक कवि की पंक्तियां हैं ,"नमन हैं उन्हें जो चले यात्रा पर लेकिन पहुंच कभी नहीं पाए/ प्रणाम है उन्हें...
ज़िन्दगी बेवफ़ा होगी, नया सफ़र शुरू होगा, मर के भी हमको कभी शिकवा ना होगा। इस जहां से ज़्यादा ख़ूबसूरत...