October 22, 2026

कविता

पितृपक्ष में कवि : स्मृतियां श्रीकांत वर्मा की

~~~~~~~ जहां बीता था संघर्ष समूचा जहां बेआवाज़ हँसी फिसलती थी बारंबार भीतर ही भीतर सूखते थे दुःख जिन गलियों...

नदी का पानी आदिवासी लड़की की हैँसी जैसा था

( आदिवासी : गीत और स्वप्न पर कुछ कविताएँ) (एक) पहाड़ की गोद में एक बहुत पुराना टूटा ढोलक पड़ा...

युद्ध सिर्फ़ सरहदों पर नहीं होते

ज़मीन को चाहे किसी भी पैमाने से माप लो उसका बँटवारा कभी नहीं होता सम-तुल्य। कहीं मौसम रंग बदल लेंगे,...

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