ग़ज़ल
भरोसा था जिसपे दग़ा दे रहा है ये रहज़न नहीं रहनुमा दे रहा है जिसे देखो वो मशवरा दे रहा...
भरोसा था जिसपे दग़ा दे रहा है ये रहज़न नहीं रहनुमा दे रहा है जिसे देखो वो मशवरा दे रहा...
मैं चुपचाप खडा रहा दरवाज़े पर सिर टिकाए रोशनी, धूल और धुएं की तरह; मैं भी आना चाहता था घर...
कम-उम्र बदन से छरहरी लाई वसंत फिर, फरवरी। शायर कवियों का दिल लेकर शब्दों का मलयानिल लेकर गाती है करमा...
हर स्त्री के पास होते हैं कम से कम दो लोकगीत एक चौखट के पास बैठकर गुनगुनाया जाता है दिन...
पढ़कर -लिखकर आगे बढ़कर उन्नति की मैं, चोटी चढ़कर राष्ट्र का अरमान बनूँगा। बाबा मैं इंसान बनूँगा। नहीं बनूँगा डाॅक्टर...
नज़र कमज़ोर हो गई... दूर का नहीं दीखता साफ मन पटल पर कुछ दृश्य धुंधलाए से हैं नज़र कमज़ोर हो...
तुम्हारी यादों की लहलहाती फसल में बिजूका सी खड़ी थी मैं अपनी सघन अनुभूतियों की पकी फसल के साथ उस...
वासंती संदली बयार बही मेरु पर्वत दीप्त हुआ तुम मिली तो, ठूंठ पर दो कोमल हरे पत्ते निकल आए रेत...
नील गगन के प्यारे पंछी उड़ते कितने सारे पंछी पेड़-गगन हैं इनकी दुनिया दिखते जहाँ हमारे पंछी इनको कभी तंग...
1 कुछ लोग जहरीली शराब पीकर मर जाते हैं मगर हमारी नई तरक्की अब चौतरफा व्याप्त है कि मरने के...