विकट थी समस्या
डाकुओं ने उसे कुछ दिन नहीं वर्षों तक अपने साथ रखा फिर भी डाकू न बना सके विष न भर...
डाकुओं ने उसे कुछ दिन नहीं वर्षों तक अपने साथ रखा फिर भी डाकू न बना सके विष न भर...
बस, तुम ही तो हो जो उत्ताल लहरों- सी उछलती समंदर की श्वेत बालू पर मेरे बदन से लिपट जाती...
क्या खोना है, क्या पाना है, जो मिलना वो गुम जाना है .. सांसें होतीं खर्च सपन पर, दौड़ा-भागी है...
उसने मुझे समेटा और कहा, कोई मेरे बारे में कुछ भी कहे, तुम मानना वही, जो तुम्हारा मन स्वीकारे मैं...
सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता हमसे दरवेश का कुन्बा नहीं बदला जाता तुमने जो चीज़ जहाँ रक्खी...
बल्ली सिंह चीमा एक ऐसे गीतकार जो खेतों में गीत गाते हैं । 2 सितम्बर 1952 को चीमाखुर्द अमृतसर में...
"सूनी कलाई" राह तकती है तुम्हारी, आज यह सूनी कलाई.... स्मृति बस स्मृति ही , शेष है सूने नयन में...
तेईस अगस्त तेईस में भारत, तकनीकी लोहा विश्व को मनवाता है। वैज्ञानिकों के संकल्पों बल से, देखो जोड़ो सीना छप्पन...
गुब्बारे जब तक बंधे थे धागे से गुलाम थे अगल-बगल झांकने के सिवा कुछ भी नहीं कर सके हवा के...
विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएँ केश तुम्हारे घुंघराले, ज्यों केशकाल की घाटी देह तुम्हारी ऐसे महके, ज्यों बस्तर की माटी....