पद्मलोचन शर्मा मुंहफट की तीन रचनाएं
हम क्या थे और क्या हो गए जीने के अब सारे- अर्थ ही खो गए सोचें हम क्या थे और...
हम क्या थे और क्या हो गए जीने के अब सारे- अर्थ ही खो गए सोचें हम क्या थे और...
अंडा कस महतारी हर सेवत हे छाती ले चिपका के साँसे म सेवत हे बुढ़वा, बचपन ल खोजत हे दाई...
बरसे बादरिया झूम-झूम , हरसे हियरा छाये उमंग । धरती गाये गीत पवन संग, चहकें चिड़िया अति प्रसन्न। सब ओर...
कलकत्ते में कभी जंगल भी थे पेड़ भी थे विशाल पौधे भी थे औषधियो के सांप भी थे बिच्छूभी थे...
विनाश विनाश करना है लेकिन कहना है विकास करना है तर्ज़ भी बता दो माडल भी दिखा दो जिस पर...
एक शहतूत का पेड़ है जिसकी शाखें ढँकने लगी हैं खिड़की का द्वार कभी-कभी सोचती हूँ शाख़ें क्यों नहीं लिपट...
मौसम नहीं बदलता है दिन-रात बदलते हैं चारों ओर वही आतप है, गहरा सन्नाटा वही गरीबी जीवन में घर में...
■ शहंशाह आलम चित्र : अशोक भौमिक कोई राजा हल चलाता हुआ देखा नहीं गया कभी तब भी राजा झूठ...
समय के सबसे भ्रष्ट और कलंकित चेहरे कर रहे हैं सभ्यता का मार्गदर्शन उन्हीं के हाथों में हैं वे रोशनियाँ...
पगले, यूँ नहीं रूकते हैं। पगले, यूँ नहीं झुकते हैं। कुछ कर जा, मैदान में आ। अलग अपनी, पहचान बना।...