आज नहीं वे…
निदा साहब आज ज़िंदगी की 87 वीं सीढ़ी पर खड़े होकर दुनिया को देख रहे होते ! उनकी यह ग़ज़ल...
निदा साहब आज ज़िंदगी की 87 वीं सीढ़ी पर खड़े होकर दुनिया को देख रहे होते ! उनकी यह ग़ज़ल...
हिन्दी नवगीत के प्रखर रचनाकार भाई भारतेन्दु मिश्र ने भी अपने लिए ज़िन्दगी का नेपथ्य चुन लिया। उन्हीं के एक...
कहते हैं मुग़लों के शासन-काल में भारतीय कामगारों को शुक्रवार के दिन छुट्टी दी जाती थी । बदमाश अँगरेज़ों ने...
जयप्रकाश मानस कुछ रंग बचे, कुछ रूप कुछ डाल बचे, कुछ पात बची कुछ धूप, बचे कुछ कूप। कुछ शब्द...
मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं, कुछ करने की अभिलाषा में मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं। मौके आए जाने...
वे तीन थे और जैसे किसी जेल में थे अंदर थी एक संकरी-सी कोठरी जिसके भीतर था उनका ही संकरा-सा...
चारो दिशाओं में फैला हुआ आकाश नीले रंग को विस्तार-सा दे रहा पहले से कुछ अधिक साफ हो चला है...
बालकनी के कोने में, वॉशिंग मशीन के नीचे मिट्टी का छोटा-सा घर बना था। पहले सिर्फ़ पीली-काली ततैया दिखती थी,...
जयप्रकाश ( दरसल यह पुरुषों के बारे में है) अब प्रेम मोबाइल स्क्रीन पर उगता है, जैसे किसी पुराने खेत...
मुझे याद नहीं वर्षों की गणना मैं कब आया हूँगा तुम्हारे सौर मंडल में! पूछना धरती के सात आवारा समुद्रों...