अर्पणा दुबे की दो कविताएँ
पिंजरा मुझे भी अपनी व्यथा कहने दो। पिंजरे से मुझे आजाद रहने दो। इस दुनिया को देखना है मुझे भी...
पिंजरा मुझे भी अपनी व्यथा कहने दो। पिंजरे से मुझे आजाद रहने दो। इस दुनिया को देखना है मुझे भी...
मनीषा बनर्जी, नागपुर (महाराष्ट्र) एक था देवदार का वृक्ष।जिस जंगल में वह रहता था वहाँ उसके आसपास तरह तरह के...
मॉस्को से सेंट पिट्सबर्ग तक की दूरी है सात सौ किलोमीटर। आम तौर पर हम भारत मे यह दूरी ट्रैन...
पानी है पर प्यास कहाँ है, चातक सा अहसास कहाँ है।। अब दिल है सोने चाँदी के, रिश्तों में विश्वास...
11/09/2021 अतीत के स्मृति सागर में जब -जब लगाती हूँ गोतें तब -तब खिल उठती हूँ मैं ले आती हूँ...
संवाद के क्षण मुझे भान होता है कि मैं ज़िंदा हूँ... मुझे ज़िंदा होने का अहसास दिलाती है भाषा! मेरी...
लेखक :- रुपाली नागर 'संझा' विधा :- यात्रा संस्मरण अपनी पहली साँस से लेकर अंतिम साँस तक यूँ तो हर...
तुम इश्क़ करना और ज़रूर करना इस तरह से करना कि एक आंच तुम्हे छूते हुए गुज़रे। तुम इश्क़ में...
मैं हिंदी भारत की बेटी,राजभाषा कहलाती हूँ। भाषाओं में ये ओहदा पाकर, मन ही मन इठलाती हूँ। जन-जन की हूँ...