लक्ष्मीकांत मुकुल की दो कविताएं
विस्तृत है पिता पर्वत की तरह अटल हैं पिता जिसकी सीधी ढलान से पाए हैं हम ऊपर चढ़ने का हौसला...
विस्तृत है पिता पर्वत की तरह अटल हैं पिता जिसकी सीधी ढलान से पाए हैं हम ऊपर चढ़ने का हौसला...
हल भी चलाएं और बीज भी बोए । सबको खिलाए और हम भूखे सोए ।। कितने लाचार मजबूर है हम...
एक शाम आप दफ़्तर से घर आते हैं -- थके-माँदे । दरवाज़े पर लगा ताला आपको मुँह चिढ़ा रहा है...
शेफाली से बिछड़े अतुल को दस साल से ज्यादा हो गए थे पर अतुल उसे एक पल को नहीं भूल...
आओ हम सब योग करें, योग से दूर रोग करें आओ हम सबको जागरूक करें आओ हम 'योग से निरोग'...
मूल लेखक : अन्तोन चेखव अनुवाद : सुशांत सुप्रिय सितम्बर की एक अँधेरी रात थी । डॉक्टर किरीलोव के इकलौते...
सुशांत सुप्रिय मेरा शरीर सड़क पर पड़ा था। माथे पर चोट का निशान था। क़मीज़ पर ख़ून के छींटे थे...
योग के संयोग से आओ धरा को स्वस्थ कर लें आओ धरा को स्वस्थ कर लें। आन की है, शान...
योग के संयोग से आओ धरा को स्वस्थ कर लें आओ धरा को स्वस्थ कर लें। आन की है, शान...
1* कुछ भी तो भूलता नहीँ बस समय के चक्र में पीछे छूट जाता है दब जाता है कहीं मन...