हाँ, मैं तुमसे प्यार करता हूँ
-------------------------------- कविता / डॉ. वागीश सारस्वत हाँ, मैं तुमसे प्यार करता हूँ तुम भी बखूबी जानती हो ये बात जान...
-------------------------------- कविता / डॉ. वागीश सारस्वत हाँ, मैं तुमसे प्यार करता हूँ तुम भी बखूबी जानती हो ये बात जान...
कविता को धैर्य पूर्वक पढ़ सकने का समय दे सकें तो पढ़े। कविता विस्तारित है किंतु , स्त्री मन की...
क्रांति का सुलगता गीत थे तुम स्वातंत्र-समरांग के संगीत थे तुम तेजाब बनकर आंख में अंगार के शोले जगाए दुश्मनों...
हरे को और हरा करती , नम को और नम करती, एकांत को और गाढ़ा करती स्मृतियों की धार को...
अभी-अभी मैंने हरसिंगार को खिलखिलाते देखा अभी-अभी मैंने एक नदी को अठखेलियाँ करते हुए समंदर की ओर बहकर जाते देखा...
सावन के बादल घिर रहे हैं घिर रहे हैं अभी घिर ही रहे हैं और हवा की गति बढ़ गई...
नहीं चाहिए नहीं चाहिए किसी को प्रेम! आज की दुनिया जैसी नहीं है रफ़्तार उसकी अलग-थलग पड़ा रहता है कोने...
अपने भीतर अवसादों को भोगूँ या फिर आह! करूँ। जिस जग ने मुझको ठुकराया उसका क्यों परवाह करूँ।। मेरे होने...
पौधा कोई पतझर में भी सूखा न छोड़िए लौट आएगी बहार, यह आशा न छोड़िए माँगे की रोशनी का भरोसा...
तुम्हारे जन्म की तारीख और जगह नही जानती थी पर तब भी पता था कि इस दुनिया मे तुम हो...