April 24, 2026

कविता

लोकगीत : गुइयाँ, ससरे में हमाई कदर न भई

बाँके सैंया अपने गोरे तन पे यूँ इतराते नंद जिठानी सँग मिलकर हम पर ताने बरसाते हमरे जियरा की काहू...

ब्रह्मराक्षस – गजानन माधव मुक्तिबोध

शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठण्डे अंधेरे में बसी गहराइयाँ जल की... सीढ़ियाँ...