इच्छा गीत
दृश्यों को बुझाकर, मुँदी पलकों पर रखे गए चुम्बनों की तरह क्या किसी ने पृथ्वी को उसके स्पर्श से पहचाना...
दृश्यों को बुझाकर, मुँदी पलकों पर रखे गए चुम्बनों की तरह क्या किसी ने पृथ्वी को उसके स्पर्श से पहचाना...
बाँके सैंया अपने गोरे तन पे यूँ इतराते नंद जिठानी सँग मिलकर हम पर ताने बरसाते हमरे जियरा की काहू...
फलक़ पर मुस्कुराती बिजलियाँ कुछ और कहती हैं ज़मी पर लड़खड़ाती कश्तियाँ कुछ और कहती हैं बया करते हैं दरवाज़े...
वे जहां कहीं चले जाते हैं वहीं छोड़ जाते हैं शरीर से उठती गंध वही अंतिम गंध जिसमें उनके पसीने...
मनुष्य गिर जाता है भाषा अकेली नहीं गिरती उसके साथ गिर जाती है मनुष्यता की समूची विरासत कहते हैं कवि...
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठण्डे अंधेरे में बसी गहराइयाँ जल की... सीढ़ियाँ...
मेरे लिये कमीज के बटन का टूटना भी कविता का विषय है टूटते नक्षत्रों को नहीं कर सकता अनदेखा ये...
एक धंधेबाज नकली कवि ने असली कवि से कहा.. मेरे पास बड़े बड़े मंच हैं हजारों की भीड़़ है.. भीड़़...
देर-सबेर आया फाग आत्मा ने देह का, अपना पहला-पहला अवलंब तज दिया था अव नये अवलंब के लिए लालायित थी...
एक पंछी अभी-अभी उड़ कर आया ऐसी जगह बैठा जहां एक मनुष्य की छाया पड़ रही थी मनुष्य जहां खड़ा...