1 मई मजदूर दिवस पर मेरी एक रचना
मजदूर मुट्ठी में बंद उष्णता, सपने, एहसास लिए,खुली आंखों से देखता है कोई …..क्षितिज के उस पार। बंद आंखों से...
मजदूर मुट्ठी में बंद उष्णता, सपने, एहसास लिए,खुली आंखों से देखता है कोई …..क्षितिज के उस पार। बंद आंखों से...
: : ग़ज़ल :: कर रहम सब को बचा मेरे खुदा ।दूर कर दे ये बला मेरे खुदा।।सह न पाऊंगा...
(1)कवि होता हैकितना लाचार,मायूस औरनिरीह प्राणी!उसेगढ़नी होती है कविताउन्हीं बेजान शब्दों सेजिनसे लोगचीखते- चिल्लातेगदहे को बाप बनातेऔरतलवे सहलाते हैं| (2)बंधुयह...
करोना के हमले ये हर सू तबाहीये दुनिया के दामन पे छायी सियाहीज़रा जाके लाशों से मांगो गवाहीजिन्हें नाज़ था...
इंतजार में पत्थरायी आँखेंछुए जाने की प्रतीक्षा मेंदो व्याकुल अधखुले होंठउँगलियों के स्पर्श को आतुरहथेलियों की सैकड़ों रेखाएँविरह की पराकाष्ठा...
जौहरी की जगह कबाड़ी हैनासमझ धूर्त है , अनाड़ी है बातें करता है रोज़ सागर कीझाँककर देखिएगा हाँड़ी है लोभ...
जी लें हर लम्हा डॉ प्रत्यूष गुलेरी राम लुभाया ठिठक गएसुबह बगीचे में सैर करतेआम्रवृक्षों व लीची के पेड़लद गए...
"दाग देहलवी" बात मेरी कभी सुनी ही नहींजानते वो बुरी भली ही नहीं दिल-लगी उन की दिल-लगी ही नहींरंज भी...
ग़ज़ल का प्रयास हम बुरे हैं या भले हैंएक अपनी रह चले हैं ख़्वाब देखे ढेर सारेबेख़ुदी के सिलसिले हैं...
मैं स्त्री हूँ बस स्त्री रहने दो नहीं बनना है मुझें बुद्ध, महावीरन निर्वाण प्राप्ति की चाह है मुझेंइस मोह...